Yantrabuddhi (यंत्रबुद्धि) by Balendu Sharma Dadhich - आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर हिंदी पुस्तक का कवर

यंत्रबुद्धि (Yantrabuddhi) — आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर बालेन्दु शर्मा दाधीच द्वारा लिखित पुस्तक

Yantrabuddhi by Balendu Sharma Dadhich: India's Comprehensive Hindi Book on Artificial Intelligence

अध्यायों की झलक

किसी लैब से नहीं, युद्धभूमि से शुरू होती है एआई की कहानी

दूसरा विश्वयुद्ध सन् 1939 में शुरू हुआ और 1945 तक चला। यह युद्ध विश्व राजनीति को पुनर्परिभाषित करने के साथ-साथ प्रौद्योगिकी में भी एक बड़े घटनाक्रम का माध्यम बना। वह घटनाक्रम था- एल्गोरिदम तथा इलेक्ट्रो-मैकेनिकल प्रणालियों की महत्ता और शक्ति को सिद्ध करना। जिस ऐतिहासिक शख़्सियत ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे थे- एलन ट्यूरिंग।

जर्मन आक्रमण से जूझते ब्रिटेन को जंगी साजो-सामान की सख़्त ज़रूरत थी। सप्लाई लेकर ब्रिटेन आने वाले जहाजों पर जर्मनी के भीषण हमले हो रहे थे और उन्हें एक-एक कर डुबोया जा रहा था।

पर्याप्त सैन्य शक्ति होते हुए भी ब्रिटेन बेबस दिखाई दे रहा था, क्योंकि इन संदेशों के जबर्दस्त एनक्रिप्शन की वजह से उन्हें डीकोड करना असंभव हो गया था।

एलन ट्यूरिंग और बॉम्ब मशीन

जर्मन तकनीकविदों ने उस ज़माने में भी 'एनिग्मा' (Enigma) नामक शक्तिशाली इलेक्ट्रो-मैकेनिकल एनक्रिप्शन मशीन विकसित की थी। ऐसे में ब्लेचली पार्क की कोडब्रेकिंग इकाई में 27 साल के एक मेधावी गणितज्ञ एलन मैथिसन ट्यूरिंग का आगमन हुआ। उन्होंने एनिग्मा के संदेशों को डीकोड करने के लिए एक इलेक्ट्रो-मैकेनिकल मशीन बनानी शुरू की, जिसका नाम था 'बॉम्ब' (Bombe)।

नौ मई 1941 को ब्रिटेन के जंगी जहाज 'एचएमएस बुलडॉग' ने जर्मनी की एक पनडुब्बी पर कब्जा कर लिया, जिसमें एक एनिग्मा मशीन भी थी। एलन की टीम ने मशीन के भीतर एक बड़ी तकनीकी खामी ढूंढी और फिर 'बॉम्ब' ने मशीनी गणनाओं के ज़रिये एनिग्मा की एनकोडिंग को तोड़ डाला और संदेश डीकोड होने लगे। इस कामयाबी ने युद्ध का जल्द अंत सुनिश्चित किया और आगे एआई की संभावना का सूत्रपात किया।

बहुत पुराना है एआई के नाम पर बेवकूफ़ बनाने का धंधा

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बारे में मीडिया पर इतनी ज़्यादा और भाँति-भाँति की बातें कही गई हैं कि हमारी समझ-बूझ गड्ड-मड्ड हो चुकी है। इनमें से ज़्यादातर बातें अतिशयोक्तिपूर्ण हैं।

अठारहवीं सदी के अंत में यूरोप और अमेरिका के दर्शकों को 'मैकेनिकल टर्क' (Mechanical Turk) नाम की मशीन ने मंत्रमुग्ध कर दिया था, जो इंसानों के साथ शतरंज खेलने और उन्हें हराने का अद्भुत कौशल रखती थी।

यह टेबल जैसी दिखने वाली लकड़ी की कैबिनेट थी जिसके पीछे एक पगड़ीधारी तुर्क का लकड़ी का मॉडल बैठा होता था । इस मशीन ने 1770 से लेकर 1838 तक सैकड़ों शतरंज खिलाड़ियों का मुकाबला किया और नेपोलियन बोनापार्ट और बेंजामिन फ्रेंकलिन जैसी हस्तियों के सामने इसका प्रदर्शन हुआ।

मैकेनिकल टर्क शतरंज इल्यूजन

वास्तव में इस कथित मशीनी इंटेलिजेंस की हक़ीक़त यह थी कि टेबलनुमा मशीन के भीतर एक दक्ष शतरंज खिलाड़ी छिपा होता था। वह लकड़ी के मॉडल के मशीनी हाथों का संचालन करते हुए चालें चलता था। आज भी अनेक उत्पाद जिन्हें एआई के रूप में प्रचारित किया जाता है, वास्तव में वे सामान्य प्रोग्रामिंग, पहले से निर्धारित निर्देशों, नियमों और स्वचालन के आधार पर काम करते हैं।

उनमें परिस्थितियों के अनुसार अपनी कार्यप्रणाली को बदलने या स्वयं सीखने की क्षमता नहीं होती, जो कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की बुनियादी पहचान है। किसी व्यक्ति के आने पर अपने आप खुल जाने वाले दरवाज़े या सेंसर आधारित कैमरे इंटेलिजेंट उपकरण नहीं हैं, बस एक ख़ास किस्म के हार्डवेयर की बदौलत ऐसा आभास देते हैं। एआई उनसे भिन्न चीज़ है।

सबसे पहले किसी के मन में क्यों आया होगा एआई का विचार?

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) की परिकल्पना नई नहीं है। पौराणिक तथा ऐतिहासिक संदर्भों को छोड़ दिया जाए तब भी, आधुनिक विज्ञान में भी, इसके बारे में गंभीरता से सोचते हुए इंसान को लगभग आठ दशक बीत चुके हैं। जिज्ञासा का विषय है कि एलन ट्यूरिंग (Alan Turing), मार्विन मिन्स्की (Marvin Minsky) और जॉन मैकार्थी (John McCarthy) जैसे गणितज्ञों और कंप्यूटर विज्ञानियों को उस ज़माने में भी इसकी ज़रूरत क्यों महसूस हुई जबकि अभी डिजिटल कंप्यूटरों का विकास अपनी प्रारंभिक अवस्था में था और इंटरनेट का आगमन तक नहीं हुआ था?

यह सवाल भी मन में आता है कि क्या मानव सभ्यता का काम आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बिना चलता नहीं रह सकता था? ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी थी कि इंसान को हज़ारों वर्षों के विकास क्रम के दौरान प्राप्त हुई बुद्धिमत्ता को मशीनी फ़ीचर में तब्दील कर दिया जाए,

भाषा और यंत्रबुद्धि

जिसे किसी उपकरण में वैसे ही फ़िट किया जा सके जैसे किसी वाहन में स्पीकर या कैमरे जैसी एक्सेसरीज लगाई जाती हैं? इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप, न सिर्फ़ मानवीय बुद्धिमत्ता का विकल्प तैयार कर दिया जाना था बल्कि इसे बहुत बड़े पैमाने पर डिजिटल उपकरणों में समाहित किया जाना था।

यह काम इतने बड़े पैमाने पर किया जा सकता था कि मशीनों की एकीकृत बौद्धिक क्षमताओं के समक्ष मानव सभ्यता की एकीकृत बौद्धिक क्षमताएँ बौनी पड़ जाएँ।

आज अधिकांश चर्चाओं के केंद्र में यह प्रश्न है कि एआई क्या है, क्या अच्छा-बुरा कर सकती है और यह मानवता के वर्तमान एवं भविष्य को किस तरह प्रभावित करेगी। ये सभी पहलू महत्वपूर्ण हैं लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण किंतु अनुत्तरित सवाल यह है कि इसे पैदा ही क्यों किया गया?

तकनीकी विशेषज्ञों से लेकर विद्यार्थियों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और जिज्ञासु पाठकों तक, यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो कृत्रिम बुद्धि को समझना चाहता है और आने वाले चुनौतीपूर्ण युग के लिए स्वयं को तैयार करना चाहता है। यंत्रबुद्धि केवल तकनीक की पुस्तक नहीं, बल्कि उस परिवर्तनशील भविष्य की एक मार्गदर्शिका है जिसमें मानव और बुद्धिमान मशीनें साथ-साथ काम करेंगी।

पुस्तक के चुनिंदा खंड

पूर्वकथा
यंत्रबुद्धि मतलब?
एआई के भीतर क्या
कैसे सीखती हैं मशीनें
इंद्रियों से होड़ लेती एआई
भाषा और यंत्रबुद्धि
सृजन करे तकनीक
चकित करते चैटबॉट
इतिहास उतार-चढ़ाव भरा
एआई, नैतिकता और कानून

हरिवंश जी ने लिखा

श्री हरिवंश

आम तौर पर धारणा है कि तकनीक एक जटिल विषय है जिस पर अंग्रेजी में ही समृद्ध एवं प्रामाणिक सूचनाएँ उपलब्ध हैं। बालेंदु जी ने यह धारणा ग़लत सिद्ध की है। एआई जैसे नए विषय पर हिंदी भाषा में लिखी अनूठी किताब है यह- टेक्स्टबुक या हैंडबुक की तरह। इसमें एआई के इतिहास, वर्तमान व भविष्य पर विशद चर्चा है। आज हम एआई द्वारा मानव जीवन की कई चुनौतियों को समझ सकते हैं, उनका समाधान कर सकते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह एआई-क्षमता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगी।

हिंदी में लिखी यह किताब न केवल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी है, बल्कि उन सामान्य लोगों के लिए भी उपयोगी है, जो इसके बारे में जानना चाहते हैं। यह किताब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी पाठकों की एआई-समझ को यह एक नए स्तर पर ले जाएगी। (पुस्तक में प्रकाशित अभिमत के अंश)

  • श्री हरिवंश, माननीय उपसभापति, राज्यसभा

सम्मतियाँ

“यह किताब एआई के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी पाठकों की एआई-समझ को यह एक नए स्तर पर ले जाएगी।”

श्री हरिवंश
श्री हरिवंश

उपसभापति, राज्यसभा

“बालेंदु जी की पुस्तक इस नवीनतम प्रौद्योगिकी पर प्रामाणिक हिंदी-ग्रंथ की आवश्यकता पूरी करेगी।”

डॉ. अतुल कोठारी
डॉ. अतुल कोठारी

राष्ट्रीय सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

“यह पुस्तक एकदम सही समय पर आई है और प्रौद्योगिकी के जिज्ञासुओं के लिए बहुत उपयोगी है।”

श्री चमू कृष्ण शास्त्री
श्री चमू कृष्ण शास्त्री

पद्मश्री, अध्यक्ष, भारतीय भाषा समिति

“हिंदी में एआई को यथोचित समग्रता से प्रस्तुत करने वाली सामग्री के अभाव के बीच यह पुस्तक विशेष रूप से स्वागत योग्य है।”

श्री अखिलेश मिश्र
श्री अखिलेश मिश्र

आयरलैंड में भारत के पूर्व राजदूत

“यह किताब एआई के भारतीयकरण की दिशा में पहला ठोस कदम सिद्ध होगी।”

श्री अमिताभ नाग
श्री अमिताभ नाग

सीईओ, डिजिटल इंडिया भाषिणी

“यंत्रबुद्धि की तीन पीढ़ियों को जानने-समझने के लिए यह पुस्तक एक अद्भुत दस्तावेज है।”

डॉ. पद्मेश गुप्त
डॉ. पद्मेश गुप्त

ऑक्सफ़ॉर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड

“एआई के इतिहास, वर्तमान, भविष्य, विवादों और नैतिकता पर समग्र दृष्टि से लिखी गई रोचक किताब है यह।”

प्रो. सुरेंद्र गंभीर
प्रो. सुरेंद्र गंभीर

पेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय, अमेरिका

“हिंदी में एआई पर इतनी सहज, विस्तृत और सूचनाप्रद पुस्तक पहली बार देखी। हमें ऐसी किताबें चाहिए।”

प्रो. अविनाश अग्रवाल
प्रो. अविनाश अग्रवाल

निदेशक, आईआईटी जोधपुर

“लेखक ने तकनीकी मुद्दों के साथ-साथ एआई के व्यावहारिक उपयोग के विभिन्न आयामों पर अद्भुत जानकारियां दी हैं।”

श्री आलोक मेहता
श्री आलोक मेहता

पद्मश्री, प्रख्यात संपादक एवं लेखक

लेखक परिचय (About the Author — Balendu Sharma Dadhich)

बालेंदु शर्मा दाधीच (Balendu Sharma Dadhich) - लेखक, यंत्रबुद्धि

बालेंदु शर्मा दाधीच प्रौद्योगिकी तथा नए मीडिया के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय और सुचर्चित व्यक्तित्व हैं। इन दिनों दुबई स्थित एल्गो टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री दाधीच लंबे समय तक माइक्रोसॉफ्ट भारत तथा माइक्रोसॉफ्ट एशिया में निदेशक पद पर कार्यरत रहे हैं। एक आईटी-उद्यमी, स्टार्टअप फाउंडर, लेखक, वक्ता और पूर्व संपादक के रूप में विविध भूमिकाओं में उनकी एक विशिष्ट पहचान एवं प्रतिष्ठा है। वे उन बिरले व्यक्तियों में हैं जो प्रौद्योगिकी, भाषा, साहित्य और मीडिया पर एक समान अधिकार रखते हैं। अपनी तकनीकी भूमिकाओं में उनका एआई तथा क्लाउड तकनीकों के साथ सीधा संबंध रहा है।

श्री दाधीच महामहिम राष्ट्रपति के हाथों प्रतिष्ठित 'आत्माराम पुरस्कार' से अलंकृत (2016) हैं। मॉरीशस के माननीय प्रधानमंत्री के हाथों से वैश्विक भाषा सम्मान (2024) सहित अन्य दो दर्जन से अधिक पुरस्कार और अलंकरण उन्हें प्राप्त हुए हैं। उनकी दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। तकनीकी विषयों पर यह छठी पुस्तक है।

लेखक ने आम लोगों के बीच तकनीक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रति जागरूकता-प्रसार तथा कौशल विकास के लिए अनेक स्तरों पर कार्य किया है। गत तीन दशकों में मुख्यधारा के मीडिया में तकनीकी विषयों पर उनके 2000 से अधिक लेखों का प्रकाशन हुआ है। उनकी ऑनलाइन तथा प्रत्यक्ष तकनीकी कार्यशालाओं से एक लाख से अधिक लोग लाभान्वित हो चुके हैं।

वेबसाइट: www.balendu.com

बालेंदु शर्मा दाधीच